डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) ने शुक्रवार को अंसल प्रॉपर्टीज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के खिलाफ इनसॉल्वेंसी की कार्यवाही को अलग रखा और फैसला सुनाया कि कंपनी के प्रबंधन को उसके बोर्ड को वापस सौंप दिया जाए। NCLAT की तीन सदस्यीय बेंच ने ऑबजर्व किया कि डिक्री होल्डर को किसी कंपनी के खिलाफ दिवालिया कार्यवाही शुरू करने के उद्देश्य से वित्तीय लेनदार नहीं माना जा सकता है। आम तौर पर, डिक्री संबंधित प्राधिकारी की ओर से जारी एक ऑफिशियल ऑर्डर है।
NCLT ने दिवालिया कार्यवाही का आदेश दिया था
अपीलेट ट्रिब्यूनल ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की दिल्ली बेंच के आदेशों को अलग रखा, जिसने 17 मार्च को अंसल प्रॉपर्टीज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (एपीआईएल) के खिलाफ दिवालिया कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया था और कंपनी के बोर्ड को रिप्लेस करते हुए एक इंटरिम रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल नियुक्त किया था। NCLT का निर्देश दो फ्लैट खरीदारों की दायर याचिका पर आया था, जिन्होंने संयुक्त रूप से लखनऊ में APIL के सुशांत गोल्फ सिटी में एक यूनिट बुक की थी। NCLT ने उत्तर प्रदेश रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (यूपी रेरा) के जारी किए गए रिकवरी सर्टिफिकेट के आधार पर APIL के खिलाफ दिवालिया याचिका को स्वीकार किया था।
सुशील अंसल की दायर याचिका पर NCLAT का फैसला
अपीलेट ट्रिब्यूनल ने कहा कि एनसीएलटी ने दो खरीदारों की याचिका स्वीकार करने में गंभीर त्रुटि की। NCLAT
ने कहा कि दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत डिक्री धारक निश्चित तौर पर कर्जदाता की परिभाषा के दायरे में आते हैं, लेकिन उन्हें वित्तीय कर्जदाता नहीं माना जा सकता है। अत: उनकी याचिका पर दिवालिया कार्यवाही नहीं शुरू की जा सकती है। अपीलेट ट्रिब्यूनल का निर्देश कंपनी के निदेशक और शेयरधारक सुशील अंसल की दायर याचिका पर आया है, जिसमें NCLT के आदेश को चुनौती दी गई थी।
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Source From
RACHNA SAROVAR
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